“हल्की सी बारिश की फुहारे, हल्की सी है धूप,
उस पर निखरता बदली जैसा उजला सुंदर रूप।
गाल गुलाबी, हया के मारे जैसे कमल खिला हो खूब,
तीखी करारी निगाहें तुम्हारी हर कोई जाता डूब।
चाल मोरनी, ढाल नवाबी, घायल दिल है खूब,
जुल्फें जैसे सावन की रातें, दिल जाता है डूब।
रुक जाए ये वक्त यहीं पर, और नजर न बदले रूप,
यूं ही चलती रहे सदा, ये हल्की बारिश और ये हल्की धूप।”
-डॉ मंजू तिवारी
