सत्ता मद में धृतराष्ट्र,
आज अंधा होकर बैठा है।
दुर्योधन भी लाल उसी का,
उससे भी कुछ हेठा है।
जंतर मंतर सभा हस्तिनापुर,
गंगा पुत्र भी चुप बैठा है।
दुर्योधन भी भरी सभा में,
द्रोपदी के सीने बैठा है।
चीर हरण करते देखा,
धर्मराज चुप बैठा है।
आज फिर हस्तिनापुर,
शर्मिंदा होते देखा है ।
कुरु सेना अबलाओं पर,
डंडा बरसाते देखा है।
सत्ता मोह सर चढ़ बोला,
पांडव मर्यादा में बैठा है।
सवालों के शस्त्र लिये,
युवाओं को देखा है।
दिल्ली की कुर्सी पर,
अहंकार चढ़ बैठा है।
मन की बात सुनाने वाला,
कब जनता की सुनता है।
धर्म का अर्थ न्याय है,
कब न्याय होते देखा है।
आज अन्याय पर चुप रहने,
फिर हस्तिनापुर शर्मिंदा है।
एकलव्य का अंगूठा काटने,
एक नया द्रोणाचार्य बैठा है।
धर्म ध्वजा ले आगे बढ़ते,
हमने पांडवों को देखा है।
भारत के गजनियों हाथों,
राम मंदिर लूटते देखा है।
शादी वर्दी मुंह छुपाये,
गुंडों को हमने देखा है।
काला को सफेद करने,
नोट बंदी होते देखा है।
मन की बातें रहने दो,
ओरों की सुनने का मौका है।
आज फिर नये महाभारत,
कि शुरुवात होते देखा है।
-शेरसिंह ढ़िकवाल ‘घायल’
पचेरी बड़ी झुंझुनूं (राजस्थान)
