एक दिन ये त्रास, ये-
अभिशाप भी मर जाएँगे!
एक दिन जल जाएँगे ये वेदना के वेद,
और धूं-धूंकर दहेंगे धर्म भी, विज्ञान भी
ज्ञान-दर्शन की तरी में होंगे अनगिन छेद,
ग्रास लेगी फिर इसे अध्यात्म की सूखी नदी।
पुण्य घुट-घुट कर मरेगा,
पाप भी मर जाएँगे।
जब मृदा को भूंज देगी भस्म होती खाद,
खोखले होकर गिरेंगे तब सघन-कानन सभी
मारने वाले बचेंगे मारने के बाद?
मार डालेगी इन्हें भी मरने वालों की कमी।
लाठियाँ मर जायेंगी व
साँप भी मर जाएँगे।
छार में खो जाएगी हर सभ्यता की खोज
अपघटित होगा जगत दूरस्थ अणुओं में कहीं
क्या बचेगा व्यंग्य-गीतों में शरों का ओज?
मुझ सरीखे लोग भी जीवित बचेंगे ही नहीं।
मैं मरूँगा, आप खुश हैं?
आप भी मर जाएँगे!
– आकाश पाठक
