तपन का हो अहसास तो समझो गर्मी है
लगने लगी हो प्यास तो समझो गर्मी है
ठंडा पीने का जब जब मन करता हो
कोई बुझा दे प्यास तो समझो गर्मी है
बिन एसी कूलर पंखा न रह पाए तो
समझो गर्मी है
मच्छर भून भून करते पास आए तो
समझो गर्मी है
बिकने आए तरबूज खरबूजा खीरा तो
समझो गर्मी है
बिक जाएं कोक लस्सी जलजीरा तो समझो गर्मी है
लदे हुए हो आम पेड़ की साँखों पर तो समझो गर्मी है
धूल के कण जाते जलन आँखों पर तो समझो गर्मी है
-किशोर छिपेश्वर “सागर “
बालाघाट
