हर इंसा के दो दो चेहरे,
इनको मैं पहचानूं कैसे,
छल प्रपंच मैं न ही जानूँ,
दिन जीवन के गुजारुं कैसे।।
कभी स्वेत तो कभी स्याह से,
उजले काले मन के ऐसे,
दुनियादारी मैं न जानूं,
दिन जीवन के गुजारुं कैसे।।
कभी देव तो कभी दैत्य से,
इनके तो व्यवहार है लगते,
ये चेहरे पहचान न पाऊं,
दिन जीवन के गुजारूं कैसे।।
कभी तो अमृत जैसे बनते,
कभी गरल के घट हैं बनते,
उल्टी भाषा मैं न जानूँ,
दिन जीवन के गुजारुं कैसे।।
जाने-अनजाने से चेहरे,
चंदन और अनल के जैसे,
अपना पराया मैं न जानूँ,
दिन जीवन के गुजारुं कैसे।
-साधना छिरोल्या
दमोह(मध्य प्रदेश)
