स्नेह नहीं अब सम्बन्धों में,
मतलब बिना कोई न यार।
यन्त्र-तन्त्र-संयन्त्र दिलों में,
मरी भावना, न कोई प्यार॥
जीव जो मेरे काम के नहीं,
छिड़क रसायन मार रहे हैं।
ईश्वर-निर्मित सृष्टि-जगत को,
मानव यम-श्मशान कर रहे हैं॥
मानवी तन में दानवी विकार,
कितना बदल गया संसार।
परोपकारिता स्वार्थ-लाभ में,
कितना भी घिनौना व्यापार॥
शाखाएँ थीं वटवृक्ष हमारी,
देती थीं संस्कारों की छाँव।
उनमें भी यांत्रिकता आ गई,
सूने हो गए सभ्यता के ठाँव॥
-नील मणि पाण्डेय
