“स्वानुभूति” “स्वयं से मिलना” उधार का ज्ञान किताब है, स्वानुभूति कलेजा है। किताब रास्ता दिखाती है, कलेजा उस रास्ते पर चलवाता है। किताब पढ़कर ज्ञानी बनते...
“स्वानुभूति” अपनी हीपीड़ा की अनुभूति मेंडूबे रह कर तुमकब तक स्वयं को /औरसमय को छलोगेजीवन ठहरने का नहींचलने का नाम हैछोड़ कर अतीत कोआगे बढ़ो /भविष्यतुम्हारी...
“स्वानुभूति” अपनी अनुभूतियों के पल दर पलसेगुजरते हुएदुनिया की नजरों से बचाकरसपनों की कोमल सेज परकभी कभी ,अपनी उम्मीदों के साफ कैनवास परआंकना चाहती हूं अनुकृति...
“स्वानुभूती” स्वयं से स्वयं का मिलन हो रहा हैक्या पाया क्या खोया आंकलन हो रहा है ।उम्र का बड़ा हिस्सा बीत चुका हैवक्त कहाँ कभी कहीं...
आज मैंने उम्र से पूछ ही लिया —ढलती जा रही हो इतनी जल्दी,क्या चाहत है जल्द पूरी होसमाप्त हो जाने की?थोड़ा रुको,जी लेने दो मुझे भी...
“स्वानुभूति” माया के आधीन था मनकाया को ही सर्वस्व जाना,दर्पण से इतर ना स्वयं को पहचाना,खुशी मिली तो हर्षाये,दर्द मिला तो दुखी हुए,इससे परे भी है...
“स्वानुभूती” आज मेरी खुद से, मुलाकात हो गई,बातों-बातों में खुद की, बात हो गई। क्या किया अब तक, क्या पाया मैंने,हाय! कैसी यह मेरी, हयात हो...
जिंदगी का ताना-बाना,बुनता रहा जिंदगी भर,जिंदगी है एक पहेली,सुलझाता रहा जिंदगी भर।। खूब हाथ-पैर मारेउत्तर एक न मिला,मकड़जाल सा देखो तो,फँसता रहा जिंदगी भर।। कभी खुशी...
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