अस्तित्व का विस्तार: स्त्री और पृथ्वी पृथ्वी सा धैर्य लिए, वह सृजन की मूक कथा लिखती है,हर आघात सहकर भी, वह अंकुर की अभिलाषा रखती है।उसकी...
आगे-पीछे हमको ही समझाने आते हैं,हम जिनकी आवाज़ उठाने आगे आते हैं। क़ुदरत का दस्तूर है ये शाखों पे गुलाबो की,फूल खिलेंगे चार मगर सौ कांटे...
तुम मुझे लौटा रहे उपहार,इससे क्या मिलेगा? चित्र तो लौटा दिए चलचित्र के छलछंद का क्या?पुष्प लेकर आ गए हो किंतु उसकी गंध का क्या?चिट्ठियाँ मसिमय...
एक दिन ये त्रास, ये-अभिशाप भी मर जाएँगे! एक दिन जल जाएँगे ये वेदना के वेद,और धूं-धूंकर दहेंगे धर्म भी, विज्ञान भीज्ञान-दर्शन की तरी में होंगे...
लौट के जब शाम को, माँ घर पे आती है,आँचल में वो अपने, दुनिया समेट लाती है। चेहरे पे कभी शिकन उसके, देखी नहीं मैंने,कोई हाल...
बहुत दिन हो गया साथी,बात किये और मिलेक्या तुम खुश हो!या दर्द के लहरों में तुम भी डूब रहे हो मुझे तो याद भी नहीं रहता...
कलम नहीं तलवार है यह,सबका ही हथियार है यह lजिम्मेदारी का बोध कराती,खुद भी जिम्मेदार है यह l डगमग कदम सँभाले इसने,शब्दों को विस्तार दियाबिन रण...
जा तुझको हमने छोड़ दिया…..तुझसे बस उम्मीदें छोड़ीना समझे वो जो मोड़ दियाजा तुझको हमने छोड़ दिया……. अन्तर्मन के गहरे तल मेंछिलते-जलते लाखों पल मेंअनगिनत मन...
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