मत मौन रहो, हुंकार भरो!अपना अस्तित्व स्वीकार करो। क्यूँ शिला तुम बनी रहो?दोष नहीं जब तुम्हारा हो?राह न तको अब किसी राम की,रावण का प्रतिकार करो!अपना...
मत मौन रहो, हुंकार भरो!अपना अस्तित्व स्वीकार करो। क्यूँ शिला तुम बनी रहो?दोष नहीं जब तुम्हारा हो?राह न तको अब किसी राम की,रावण का प्रतिकार करो!अपना...
इन मौन भटकते गीतोंयदि तुम वँशी का स्वर दे दो मैं व्यथा कहूँ कैसे अपनीउन्मन मन की क्या अभिलाषाभावों के भटके हुये शलभजलना यौवन की परिभाषा...
कभी-कभी यूँ लगता हैजैसे ज़िंदगी यूँ ही बेमकसद सी गुज़र रही है,सुबहें आती हैंअपने तय समय पर,खिड़कियों पर धूप भी उतरती है,पर भीतर कहींएक कोना वैसा...
अपने वायदों से मुकरते हुए देखे बहुतबसे-बसाए घर उजड़ते हुए देखे बहुत। काश! मेरा भी कोई सच्चा हमदर्द होताबोल हमदर्दी के उगलते हुए देखे बहुत। वक़्त...
मेरा देश मेरा शहर भी,चीख रहा है,बिलबोर्ड, ट्रेंड, ट्रोल, ट्रैफिकऔर मैं,बीच चौराहे पर,मौन की चादर ओढ़े,खड़ा हूँ।बोलना चाहता हूँ,पर हर लफ्ज़ के आगे,डर का पहरा है,सत्ता...
(मनहरण घनाक्षरी काव्य) हवाओं से पूछूं पता,कहां हो तुम लापता।दिल ये तुम्हें ढूंढता,बदलें आलम में। यादें तुम्हारी रूलाती,कांटों सा हमें चुभती।उदासी में जलें काया,बदलें आलम में।...
वोएक आम पुरुष था,जिम्मेदारियों की गठरी ढोता हुआकभी-कभी मुस्कराताकभी निःशब्द-सा। उसकी ज़िंदगी मेंसब कुछ थासमर्पण, समझौते, स्थिरता। फिर भी, भीड़ में कभी-कभारकोई सामान्य-सी स्त्रीबिलकुल वैसे ही...
मतलबी दुनियाकभी बसती थीदुनिया दिलों में,कट जाती थी ज़िंदगीसुख-दुःख साझा करते हुए। जला हुआ था दीपककरुणा, ममता और दया का,बहती थीं नदियाँशांति और अमन की। पर...
हम दोनों के बीचयह मौनक्या तोड़ा नही जा सकताक्या शब्दों के वे सारे सेतुजो हमेंकल तक बाँधे थे,टूट गए?याद है यह जगह..?जहाँ से कई झरने फूटेऔर...
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